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सेवा परिश्रम ओर प्रयास , Care, Hard work, and Effort

उत्तर भारत के सुंदर शहर **सूर्यपुर** में एक मेहनती कैब चालक **रामदास** अपने परिवार के साथ रहता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी **सावित्री** और बारह साल का बेटा **दीपक** था। दीपक पास के **सरस्वती विद्या मंदिर** में सातवीं कक्षा में पढ़ता था। वह पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी कि वह अपने पिता की हर छोटी बात को ध्यान से सुनता था। हर सुबह रामदास सूरज निकलने से पहले अपनी कैब लेकर निकल जाता। दिन भर शहर की सड़कों पर यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाता और रात होने पर घर लौटता। चेहरे पर प्रसन्नता रहती, लेकिन शरीर पूरी तरह थक जाता। घर आते ही वह हर बार एक ही बात कहता। "आज फिर कमर टूट गई। यह सीट बहुत कठोर है। पूरे दिन बैठने से पीठ में बहुत पीडा होती है।" दीपक चुपचाप यह बात सुनता रहता। उसने देखा कि उसके पिता कई बार गाड़ी से उतरते समय धीरे-धीरे चलते हैं। कभी पीठ पकड़ते, तो कभी कमर सीधी करने की चेष्ठा करते। एक दिन दीपक ने पूछा, "पिताजी, नई सीट क्यों नहीं लगवा लेते?" रामदास ने प्रसन्न होते हुए कहा, "बेटा, अच्छी सीट बहुत कीमत की आती है। पहले घर चलता रहे, यही बड़ी बात है।" उस दिन से दीपक के मन में एक नया विचार आया।