आत्मा -- एक प्रेम कहानी भाग - 10
कार **देव (साक्षी)** चला रहा था। परंतु कार की गति इतनी धीमी थी मानो कोई बैलगाड़ी चल रही हो। देव (साक्षी) ने दोनों हाथों से 'स्टीयरिंग व्हील' को अत्यंत कठोरता से पकड़ा हुआ था, और उसकी दृष्टि मार्ग के एक-एक पत्थर पर थी। वह देव के विशाल शरीर में होते हुए भी भयभीत था कि कहीं कोई झटका लगने से उसके केश (बाल) न बिगड़ जाएं। बगल वाली आसंदी (सीट) पर **साक्षी (देव)** बैठी थी। साक्षी का वह कोमल मुखमंडल अब क्रोध से लाल हो चुका था। वह अपने पैर निरंतर थपथपा रही थी। **साक्षी (देव):** (क्रोधित स्वर में) "हे ईश्वर! तुम यह वाहन चला रहे हो या चींटी की भांति रेंग रहे हो? यदि हम इसी गति से चले, तो देवालय पहुँचने तक तो युग बीत जाएंगे! गति बढ़ाओ!"